Skip to main content

जरूर पढ़े

युवा समाज सुधारक संघ
【ये कहानी जरूर पढ़ें】
,
एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी
औरत से एक युवाअक्सर संतरे खरीदता ।
'
अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा
निकाल उसकी एक फाँक चखता
और कहता, "ये कम मीठा लग रहा है, देखो !"
'
बूढ़ी औरत संतरे को चखती और
प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!"
'
वो उस संतरे को वही छोड़,
बाकी संतरे ले गर्दन झटकते
आगे बढ़ जाता।
'
युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था।
एक दिन पत्नी नें पूछा
"ये संतरे तो हमेशा मीठे ही होते हैं,
फिर यह नौटंकी तुम हमेशा
क्यों करते हो ?"
'
युवा ने पत्नी को एक मघुर
मुस्कान के साथ बताया
"वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है,
पर खुद कभी नहीं खाती,
इस तरह उसे मै संतरे खिला देता हूँ ।
'
उसके संतरे भी बिकते है और
उसमें से अंततः एकाद उसे भी
खाना नसीब हो जाता है।
और नुक्सान भी नहीं होगा।
'
बुढ़िया के पड़ोस में बैठी सब्जीवाली
भी रोज का यह माज़रा देखती।
.
एक दिन, बूढ़ी माँ से उस सब्जी बेचनें
वाली औरत ने सवाल किया,
ये झक्की लड़का संतरे लेते इतना
चख चख करता है,
रोज संतरों में नुस्ख निकालता है,
तुझे भी चखाता है।
पर संतरे तौलते समय मै तेरे
पलड़े देखती हूँ, तू हमेशा
उसकी चखने की झक्की में,
उसे ज्यादा संतरे तौल देती है ।
ऐसे लड़के के पीछे क्यों अपना
नुक्सान करती हो?
''
तब बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने
वाली से कहा
"उसका चखना संतरे के लिए नहीं,
मुझे संतरा खिलानें को लेकर होता है।
,
बस इतना ही है की वो समझता है
में उसकी यह बात समझती नही।
लेकिन मै बस उसका प्रेम देखती हूँ,
पलड़ो पर संतरे तो अपने
आप बढ़ जाते हैं ।
,
विस्वास कीजिये कभी कभी जीवन
का आनंद इन्हीं छोटी छोटी
बातों में आता है।
,
पैसे नहीं दूसरों के प्रति प्रेम
और आदर ही जीवन में मिठास
घोलता है।
देने में जो सुख है वह
छीनने-पाने में नहीं।
खुशियां बांटने से बढ़ेंगी ही; नुक्सान नहीं होगा।
.
:- अगर अच्छा लगे तो शेयर जरूर करे ।

Comments

Popular posts from this blog

जो होगा अच्छा होगा

एक आदमी की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नि के साथ वापिस आ रहे थे! रास्ते में वो दोनों एक बडी झील को नाव के द्वारा पार कर रहे थे, तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान आ गया ! वो आदमी वीर था लेकि...

सबकुछ परमात्मा पर छोड़ दो

एक पुरानी सी इमारत में वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो। एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्त...

इरादा पक्का होना चाहिए

"युवा समाज सुधारक संघ" *ek ek point dhayaan se pado* *Quote 1 .* जब लोग आपको *Copy* करने लगें तो समझ लेना जिंदगी में *Succes s* हो रहे हों. *Quoted 2 .* कमाओ…कमाते रहो और तब तक कमाओ, जब तक महंगी चीज सस्ती न लगने लगे. *Quote 3 .* जिस व्यक्ति के सपने...